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साइबर ठगी के 9 महीने बाद भी ACMO को नहीं मिला न्याय, पुलिस की कार्रवाई पर बड़ा सवाल

साइबर ठगी के 9 महीने बाद भी ACMO को नहीं मिला न्याय, पुलिस की कार्रवाई पर बड़ा सवाल
 

सहारनपुर। उत्तर प्रदेश में साइबर अपराधियों के हौसले किस कदर बुलंद हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जिले के सरकारी अस्पताल में एसीएमओ (ACMO) के पद पर तैनात एक जिम्मेदार चिकित्सा अधिकारी भी डिजिटल ठगों का आसान शिकार बन गए और तंत्र हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा। जिला अस्पताल के एसीएमओ डॉ. आदित्यपाल सिंह सैनी के साथ हुई ₹4.19 लाख की बड़ी साइबर धोखाधड़ी के मामले में पुलिसिया कार्रवाई की सुस्त रफ्तार अब बड़े सवाल खड़े कर रही है। पीड़ित डॉक्टर ने घटना के बाद तत्काल साइबर क्राइम पुलिस थाना सहारनपुर में लिखित शिकायत दर्ज कराई थी, जिसके आधार पर पुलिस ने पिछले साल 8 अगस्त 2025 को मुकदमा संख्या 0032 दर्ज किया था. इस एफआईआर में भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 318(4), 319(2) और सूचना प्रौद्योगिकी संशोधन अधिनियम की धारा 66D जैसी गंभीर धाराएं लगाई गई थीं, लेकिन आज करीब 9 महीने का लंबा समय बीत जाने के बाद भी जांच के नाम पर नतीजा बिल्कुल शून्य नजर आ रहा है।​यह पूरा मामला एक सोची-समझी डिजिटल साजिश का हिस्सा था, जिसमें ठगों ने पीड़ित के मोबाइल पर व्हाट्सएप के जरिए एक संदिग्ध एपीके (APK) फाइल भेजी थी. जैसे ही पीड़ित ने उस फाइल को खोला, उसी दिन 24 जुलाई 2025 को उनके भारतीय स्टेट बैंक (SBI) के खाता संख्या 10961070628 से ₹4,19,000 की रकम साफ कर दी गई. एफआईआर के मुताबिक, वारदात के तुरंत बाद नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल पर भी पावती संख्या 23107250106599 के तहत शिकायत दर्ज कराई गई थी. पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच की जिम्मेदारी सीधे इंस्पेक्टर संजय सिंह को सौंपी थी. लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि घटना को बीते लगभग 10 महीने और एफआईआर दर्ज हुए पूरे 9 महीने का वक्त हो चुका है, फिर भी पुलिस प्रशासन अपराधियों का सुराग लगाने में पूरी तरह नाकाम साबित हुआ है। ​इतने लंबे समय के बाद भी पीड़ित अधिकारी को अब तक कोई संतोषजनक कार्रवाई या अपने पैसे वापस मिलने की उम्मीद नजर नहीं आई है, जो सीधे तौर पर साइबर सेल की कार्यप्रणाली और उनकी आधुनिक तफ्तीश के दावों की पोल खोलता है. जब जिले के एक उच्च पदस्थ अधिकारी के साथ हुई धोखाधड़ी में पुलिस का यह ढुलमुल रवैया है, तो आम जनता के मामलों में क्या स्थिति होती होगी, इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। इस मामले में जांच अधिकारी और संबंधित वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की यह खामोशी और सुस्ती कई गंभीर सवाल खड़े करती है कि आखिर इतने महीनों बाद भी तकनीकी साक्ष्यों और बैंक खातों के विवरण होने के बावजूद साइबर टीम अपराधियों तक क्यों नहीं पहुंच पाई है और पीड़ित को न्याय के लिए और कितना इंतजार करना पड़ेगा।

रिपोर्टर: निखिल सैनी, सहयोगी आदित्यपाल सैनी (सहारनपुर)