आज पता नहीं क्यों, दिल बहुत भारी है…
ज़िंदगी का कुछ भरोसा नहीं होता। हम अपनी छोटी-छोटी परेशानियों में उलझे रहते हैं, और कहीं किसी घर में एक पल में सब कुछ बदल जाता है। सबसे ज़्यादा तकलीफ़ इस बात की है कि मैं कुछ कर भी नहीं सकती। बस स्क्रीन के सामने बैठकर ये सब देख सकती हूँ, कुछ पंक्तियाँ लिख सकती हूँ, दुआ कर सकती हूँ… और फिर भी दिल को लगता है कि इतना सब काफ़ी नहीं है। यह बेबसी अंदर से तोड़ देती है।कभी किसी और के साथ हुआ दर्द भी अपना-सा लगने लगता है… और आज बस मन में एक ही सवाल है — भगवान, अल्लाह, यीशु… आप कहाँ थे? इन बच्चों का क्या कसूर था? क्यों उनकी ज़िंदगी इतनी जल्दी बदल गई?
मेरे पास इन सवालों का कोई जवाब नहीं है। बस आज दिल बहुत दुखी है… और बहुत बेबस भी।
क्योंकि वे सिर्फ़ एक ख़बर नहीं थे… वे किसी के बच्चे थे, किसी की पूरी दुनिया थे। 💔🕊️
दिव्या भारद्वाज