यौमे-आशूरा पर अकीदत और एहतराम के साथ निकाला गया मोहर्रम का ऐतिहासिक जुलूस
मेरठ: मोहर्रम की चांद की 10 तारीख यानी 'यौमे-आशूरा' के पावन और गमगीन अवसर पर मेरठ शहर में अकीदतमंदों द्वारा पूरी अकीदत और शांतिपूर्ण तरीके से मोहर्रम का मुख्य जुलूस निकाला गया। यह दिन इस्लामी इतिहास में बेहद अहम और मजलूमों की आवाज का प्रतीक माना जाता है। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, इसी दिन पैगंबर मोहम्मद साहब के नवासे हजरत इमाम हुसैन इब्ने अली और उनके जांबाज साथियों की इराक के कर्बला के मैदान में बेरहमी से शहादत हुई थी। इमाम हुसैन ने उस वक्त के जालिम शासक के सामने घुटने टेकने या जुल्म को स्वीकार करने के बजाए, सच्चाई, हक और इंसाफ का रास्ता चुना। उन्होंने मानवता की रक्षा के लिए अपना और अपने पूरे परिवार का बलिदान दे दिया। यही कारण है कि पूरी दुनिया के मुसलमान और इंसानियत को मानने वाले लोग उन्हें बेहद इज्जत, अदब और मोहब्बत से याद करते हैं और इस दिन अपने-अपने तरीकों (मातम, मजलिस और लंगर) से शोक जाहिर करते हैं। मेरठ में यौमे-आशूरा का यह मुख्य जुलूस परंपरागत रूप से शहर के ऐतिहासिक घंटाघर से शुरू हुआ। जुलूस में भारी संख्या में अकीदतमंद काले लिबास पहनकर और 'या हुसैन' की सदाएं बुलंद करते हुए शामिल हुए। गमगीन माहौल में आगे बढ़ता हुआ यह जुलूस शहर के मुख्य मार्ग रेलवे चौराहा से होकर गुजरा। पूरे रास्ते में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम रहे। अंत में यह ऐतिहासिक जुलूस अपने तयशुदा मकाम मांसाबिया पर पहुंचकर पूरी अकीदत के साथ शांतिपूर्वक संपन्न हुआ, जहाँ विशेष दुआएं मांगी गईं।
रिपोर्टर: शाहिद हसन, सहयोगी: बबलू कुरैशी (मेरठ)